ख़बरों के बाज़ार में …..

ख़बरों के बाज़ार में दिखने लगा हूँ मैं
लगने लगी है बोली , बिकने लगा हूँ मैं.

सिक्के उछालों और कर लो , ईमान का सौदा
अपने नंगेपन को शब्दों से , ढँकने लगा हूँ मैं.

सेवा कबका व्यापर बन चुकी , ख़बरें कबसे बिकने लग गई
अब रातों को अपने ऊपर हँसने लगा हूँ मैं.

पत्थर से एहसास हो गए , बिकने लगी है आस ,
अब सेठों की बातों को रटने लगा हूँ मैं.

सच के वर्क मैं झूठ की बिक्री , संवेदना की लगती बोली
दवा के नाम पर ज़हर गटकने लगा हूँ मैं.

ख़ौफ का फैला झूठा जंगल , ख़ुशी हुई है ग़रीब,
सच के मरुस्थल मैं भटकने लगा हूँ मैं

राजदीप …

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/10/2015

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