विलक्षण मानव

मैने तुझको लिप्त है देखा
भोग विलास के प्रकारो में,
मैने तुझको जाते है देखा
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारो में |

भाई को भाई से लड़ते देखा
लड़ते लड़ते मरते देखा
किसी अंजान की खातिर
दुनिया से भी झगड़ते देखा |

देखा मैने तुझको खेलते
नारी के अधिकारो से
कभी भरी कलाई देखी
राखी के त्योहारो से |

मैने प्यार के धोखे में
अस्मत को भी लूटते देखा
बड़ी बड़ी दीवारो बीच
नाज़ुक दिल को टूटते देखा |

एक मा को मैने रोते देखा
बेटो को भूखे सोता देखा
दूर कही एक मंदिर में
भंडारा भी होते देखा |

कई संस्कृति मिटाते देखा
एक नई संस्कृति बनाते देखा
किसी और के सपनो पर
सपनो का महल बनाते देखा |

किसी की खातिर जाल बिछाया
उसी जाल में फसते देखा
कभी कभी तो बिना बात के
रोते और फिर हसते देखा |

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/10/2015
    • शिवदत्त श्रोत्रिय 16/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/10/2015

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