सब धोखा है – शिशिर “मधुकर”

किसको अपना समझो यहाँ तो सब धोखा है
मन को उज्जवल रखने से सबने रोका है
सर्वस्व न्योछावर आज ग़र तुम किसी पर करते हो
बदले में सम्मान मिलेगा ये तो है एक भ्रम तुम्हारा
आज लोग जीते मरते हैं खुद की ख़ातिर
भौतिकता में खो गया है सच्चा प्रेम हमारा
आज नारियों में सीता का आदर्श कहाँ है
पुरुषों में भी राम के जैसा दर्श कहाँ है
आज विवाह के माने भौतिक इच्छाओं का परित्याग नहीं है
आज पति पत्नी के मध्य में पूर्ण समर्पण भाव नहीं है
हर इंसा को एक जनम में सब कुछ पाने की है अभिलाषा
झूठी शान दिखाती दुनिया भूल चुकी है संतोष की भाषा
हँसते चेहरों के पीछे लोगों ने कैसे जाने ये ग़म रोका है
किसको अपना समझो यहाँ तो सब धोखा है
मन को उज्जवल रखने से सबने रोका है

शिशिर “मधुकर”

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 15/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 15/10/2015
  3. Uttam Uttam 16/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/10/2015

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