चाहतों की इमारतें… (एक प्रयास)

इस ग़ज़ल में कुछ नया करने का प्रयास किया है। उम्मीद है आप सब इसका लुत्फ़ उठाएंगे।

चाहतों की इमारतें सब पुरानी हो गयीं।
कोई ताजमहल हो गयी तो कोई वीरानी हो गयी।।

क़ातिलाना निगाहों से यूं हमको न देखो।
ये बताओ की हमसे क्या नादानी हो गयी।।

एक दोस्त की हरकत पे वो बोला फिर यूं।
ये क्या किया तूने यार, कहानी हो गयी।।

कल ग़ालिब की एक नज़्म क्या सुनाई उसको।
क्या बात है यार वो तो दीवानी हो गयी।।

एक मुद्दत के बाद आज पीने को मिली है।
चलो अच्छा है ‘आलेख’, शराब पुरानी हो गयी।।

— अमिताभ ‘आलेख’

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 14/10/2015

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