मेरे बच्चों से…

मेरे बच्चों से मेरी अब यही फ़रियाद होती है।
मेरे कमरे के दरवाज़े से अब आवाज़ होती है।।

जिसे पढ़कर जलाता है वो शहर की बस्तियां अक्सर।
वो मज़हब कौन सा है जहां ऎसी किताब होती है।।

बेटों के इरादे दिल को भी अब खुश नहीं रखते।
परायी होके बेटी फिर भी एक एहसास होती है।।

जो गुज़रा कल मैं मेले से फ़कीर एक गा रहा था यूं।
किसी के काम न आये वो दौलत ख़ाक होती है।।

पढ़ा है एक सुख़नवर का दीवान-ऐ-ख़ास मैंने भी।
जो बातें कह गया ‘आलेख’ अलग अंदाज़ होती है।।

— अमिताभ ‘आलेख’

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 14/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 14/10/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 14/10/2015

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