नारी ……………( ग़ज़ल )

क्यों रूप दिया कुदरत ने,सबकी नजरो में आती हूँ !
हुस्न, इश्क, मोहब्बत के नामो पर भोगी जाती हूँ !!
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माँ – बाप के लिए बोझ, प्रेमिका बन सबको भाती हूँ,
पत्नी रूप में व्यंग की परिभाषा, माँ रूप में लुभाती हूँ !!
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खाकर गम, लफ्जो का कड़वे जहर पिए जाती हूँ !
जिंदगी हारकर तुझपे, मर मर के जिए जाती हूँ !!
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ऐ जिंदगी अब तू ही बता क्यों नारी बन आती हूँ !
मतलबी इस दुनिया में अपना अस्तित्व मिटाती हूँ !!
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बन के भोग की वास्तु चौराहो पर सरेआम लूटी जाती हूँ
सुनो “धर्म” रीत जमाने की, नौ दुर्गा रूप में पूजी जाती हूँ !!
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[[______डी. के. निवातियाँ _____]]

8 Comments

  1. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 14/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/10/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/10/2015
  4. sushil sushil 14/10/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/10/2015
  5. Bimla Dhillon 15/10/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/10/2015

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