जो सुनना चाहते हो…

जो सुनना चाहते हो तुम, जुबां वो कह नही पाती।
जो दिल में आरज़ू है इक, जुबां पर क्यूँ नही आती।।

सामने रोज़ आते हो ख़यालों में हक़ीक़त में।
जो मंज़िल सामने है फिर, राह क्यूँ मिल नही पाती।।

इन आँखों की तमन्ना है दीदार-ए-ख़्वाब करने की।
नींद तो आ भी जायेगी, शाम क्यूँ ढल नही पाती।।

तुम्हारे नूर से मेरी ये आँखें धुल गयीं ऐसे।
की इनमे नाम बस तेरा, मगर तुम पढ़ नही पाती।।

ख़ुदा का शुक्र है ‘आलेख’, मिलाया यूं हमे ऐसे।
न मैं होता न होती तुम, निगाहें मिल नही पाती।।

— अमिताभ ‘आलेख’

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/10/2015
  4. Uttam Uttam 13/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015

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