अपनी हालत पे ज़रा…

अपनी हालत पे ज़रा तो रहम खाया कीजिए,
मेरी खातिर ही सही पर मुस्कुराया कीजिए।

माना के हैं ग़म बहुत ज़िन्दगी में आपकी,
हमसे मिलकर आप अपना ग़म भुलाया कीजिए।

हमको अपने इश्क़ पे भी है यकीं यूं तो मगर,
आप भी हमको कभी तो आज़माया कीजिए।

आपकी आवाज़ में है कुछ न जाने क्या कशिश,
सुर्ख होठों से कभी हमको बुलाया कीजिए।

हर सितम मंज़ूर है हमको ज़माने का मगर,
आप अपनी शोखियों से बाज़ आया कीजिए।

वक़्त गुज़रेगा तो फिर ये फ़ासले मिट जाएंगे,
आप अपने दिल को थोड़ा तो सम्भाला कीजिए।

मुस्कुराहट का भी है इस हुस्न से कुछ वास्ता,
आप अपने हुस्न को यूं भी संवारा कीजिए।

दास्तान-ए-इश्क़ जब ‘आलेख’ भी न कह सका,
आप अपना वक़्त इसमें अब न ज़ाया कीजिए।

— अमिताभ ‘आलेख’

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015

Leave a Reply