ग़ज़ल कुछ इस तरह…

ग़ज़ल कुछ इस तरह से लिखने लगा है वो,
खुशबू की तरह दिल में महकने लगा है वो ।

आसुओं से करता रहा नफ़रतें जो उम्र भर,
गम-ए-दिल पी के अब बहकने लगा है वो ।

वक़्त भी कुछ इस तरह की चाल चल गया,
के राह-ए-ज़िंदगी में अब भटकने लगा है वो ।

कल तक जो हौसला था अब वो नहीं रहा,
एक उम्र हो गयी है बिखरने लगा है वो ।

माहौल भी शहर का ‘आलेख’ बदला है इस तरह,
अपने ही घर में हर रोज़ सिमटने लगा है वो ।

— अमिताभ ‘आलेख’

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 12/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 12/10/2015

Leave a Reply