कभी कश्तियों की निगाह से…

कभी कश्तियों की निगाह से समन्दरों को तक़ा करो।
एक मौज में है डूबना एक मौज में फिर ज़िंदगी।।

वो ‘दिया’ था उसने भी एक रोज़ कहा था अपनी ‘लौ’ से ये।
ग़र तू नहीं जो साथ तो कुछ भी नही ये ज़िन्दगी।।

क्या हवा चली थी वहां कोई वो कौन सा था धुंआ उठा।
वो क्या हुआ था शहर में क्यूँ जल गयी एक ज़िन्दगी।।

जो गौर से देखो अगर हर क़ौम में भी है ज़िन्दगी।
फिर ज़िन्दगी से लड़ रही है आज क्यूँ ये ज़िन्दगी।।

वो तेरा करम वो तेरी दुआ ‘आलेख’ सब रह जायेगा।
एक बार ग़र जो चली गयी फिर हाथ से ये ज़िन्दगी।।

— अमिताभ ‘आलेख’

11 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 12/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 12/10/2015
      • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/10/2015
        • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 12/10/2015
          • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/10/2015
  3. Bimla Dhillon 13/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015
  4. Uttam Uttam 13/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015

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