।।ग़ज़ल।।मेरा किरदार पढ़ लोगे।।

।।ग़ज़ल।।मेरा क़िरदार पढ़ लोगे।।
R.K.MISHRA

मेरी खामोशियो में भी मेरा इज़हार पढ़ लोगे .
कभी दिल से जरा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे .

न साहिल है न मंजिल की मुझे परवाह रहती है .
मग़र है आँख का दरिया छलकता प्यार पढ़ लोगे .

जरा तुम रोककर कर देखो हमारे आँख के आंशू .
झलकती झील में अपना अलग संसार पढ़ लोगे..

अभी तक बात करते हो हमेसा ही इशारों से .
जरा आग़ोश में आओ दिली झंकार पढ़ लोगे .

महज़ ये फ़ासले ही है जो हमको दूर करते है ..
यकीनन पास आये तो मेरा इनकार पढ़ लोगे ..

अग़र है शौक तुमको तो जाते हो चले जाओ .
ज़रा फिसले मुहब्बत में ग़मो की मार पढ़ लोगे ..

नही होते है पैमाने किसी से प्यार करने के ..
खुली दिल की किताबो में लिखा एतबार पढ़ लोगे..

×××

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/10/2015
  2. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 01/11/2015
  3. RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 03/11/2015
  4. रकमिश सुल्तानपुरी राम केश मिश्र "राम" 17/11/2015

Leave a Reply