वक़्त… (नज़्म)

रात ख्वाब में मेरे वक़्त आया
बड़ी खामोशी के साथ आया
गौर से देखा जो मैंने उसको
कुछ परेशां परेशां सा पाया ।

बांह वक़्त की पकड़ फिर मैंने उसको
अपने बिस्तर के सिरहाने बिठाया
प्यार से हाथ फेर कर सर पर
थोडा उसे फिर दिलासा दिलाया ।

वजह मैंने उस से जो आने की पूछी
कहानी उसने अपनी फिर जो सुनायी
सुनकर उसके हृदय की व्यथा को
आँखें मैंने अपनी बहुत सुर्ख पायीं ।

बोला माहौल शहर का ये कैसा हुआ है
हर शख्स जैसे बदला बदला हुआ है
नफ़रतों की लगी हुई हर सिम्त झड़ी है
मोहब्बत की धड़कन भी धीमी पड़ी है ।

हर दिल में नफ़रत क्यूँ उबल रही है
इंसानियत न जाने क्यूँ गिरी पड़ी है
उम्मीद से घर जो सजाया था सबने
बँटवारे की उसमे दरारें पड़ी हैं ।

लड़खड़ायी ज़ुबाँ से सहमते सहमते
आगे की बाक़ी कथा उसने की व्यक्त
अपनी अश्कों की धारा को उस से छुपाकर
साँसों को अपनी किया हमने भी सख्त ।

माँ की इज्ज़त बहन की अज़मत
मोल इनका अब कुछ भी नहीं है
दलाल बैठे हैं व्यापार करने
बाज़ार में सब लुटे जा रही हैं ।

अइय्याशी की महफ़िलों में देखो
अमीरी धुंआ उड़ा रही है
गरीबी अपना पेट पकड़कर
घर घर बर्तन घिसे जा रही है ।

ये कहते उसका भर आया गला जो
मुझे बेबसी से लगा देखने वो
मैं विवश था आज फिर वक़्त के आगे
जो समझा नही था सब समझा गया वो ।

सवेरा हुआ ख्वाब टूटा मेरा फिर
सवाल मेरे दिल ने मुझसे किया फिर
क्या आदमी को बनाता है ये वक़्त, या फिर
वक़्त को आदमी ने ऐसा बनाया है या फिर ।

कहते सुना था ये लोगों को हमने
कि चलता नहीं ज़ोर वक़्त पर किसी का
मगर हुआ यकीन आज मुझको ‘आलेख’…..
कि ज़ोर चलता नहीं आदमी पे किसी का…!!!
ज़ोर चलता नहीं आदमी पे किसी का…!!!

— अमिताभ ‘आलेख’

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 12/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 12/10/2015

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