।।दोहे किसान के प्रति।।

।दोहे।।किसान के प्रति।।
R.K.MISHRA

दिनकर से पहले उठत,होय न देत अंजोर ।
राम कृषक जन जात है,निज खेतोँ की ओर ।।

चना चबैना चल दिये,गमछा अउर कुदाल ।
राम लिये गुड़ पोटली,चलते मधुरिम चाल ।।

आलू बोये होत हैं ,आलू के ही पेड़ ।।
राम कभी निज श्रम बिनु,जामि सके न रेड़ ।।

पौधों की अति दुर्दशा, मेड़ी दियो बिगाड़ ।
राम सूअर वन रात में, पौधे दिये उखाड़ ।।

राम दुःखी अति दीन उर, वाणी गयी सुखाय ।
मेहनत का फल न मिले, मन ही मन पछताय ।।

निरखि निरखि निज खेत को ,लगी धूप अकुलात ।
राम चबेना मेड़ पर, पड़ा रहत बसियात ।।

चूंटो की लश्कर चली, कौआ बोले काँव ।
राम गुड़ै पर माति गै, करते रहत खिंचाव ।।

कबहू सूखा बाढ़ तो, कबहु होत अतिवृष्ट ।
राम किसानी भाग्य के, होतै रहत अनिष्ट ।।

जिह किसान उपजात है, फसल अनेक प्रकार ।
राम वही भुखमरी के, होते यहा शिकार ।।

जो किसान सम्मान बन , थे भारत की शान ।।
राम बने मजदूर है, छोड़ खेत खलिहान ।।

×××

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/10/2015
  3. रकमिश सुल्तानपुरी राम केश मिश्र "राम" 13/10/2015

Leave a Reply