।।कविता।।मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

।।कविता।।मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

R.K.MISHRA

विश्वासो की डोर पकड़कर
चलता हूँ मनमारे
अंधकार यह ढह जायेगा
शायद धीरे धीरे
ज्ञान के दीपक
जल जायेंगे
तब सच का आह्वान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

भावो के पुल के ऊपर रख
हृदय का प्रकाश
सम्बन्धो के दृढ़ बन्धन से
रच दूँगा इतिहास
आहो से उभरे
गीतों का
मधुरिम स्वर हर गान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

किस कारण से भ्रस्ट हो रहे
मानवता के नागर
किस कारण से नही झलकती
सच की मोटी चादर
जिनके अंदर
झूठे मुखड़े
छिपे हुये व्यवधान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

दीनो की निर्मम आहो पर
जब पिघलेगा हृदय
असहायों का हाथ पकड़कर
पायेगे सुख निर्भय
पावन होगा
मन मन्दिर तब
विश्व भवन निर्माण करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

इतने कच्चे जीर्ण न होंगे
सम्बन्धो के धागे
तब लालच की परत न होगी
नयन ज्योति के आगे
धन का धनी
धनी न होगा
चूर सभी अभिमान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

नही बह सकेंगे आँखों से
स्नेहो के पानी
नही गढ़ सकेगा फिर कोई
दुख़ की नयी कहानी
विकलता का
लेस न होगा
हृदय विचार प्रधान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

दया धर्म में नही रहेगी
तब कोई कृपणता
अभिमानो की झलक न होगी
जाति पांति में समता
मानवता के
एक ही बन्धन
में सबका अवधान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

मानव प्रेम मात्र पर निर्भर
इक संसार बनाऊगा
कठिन रास्ते दुख़ के झिलमिल
पर परचम लहराउगा
स्नेहो की
नदी बहकर
जन जन को इंसान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

उस दिन जब मैं कह पाउगा
इस जग की सच्चाई
तब जीवन का त्याग करूँगा
चुका के पाई पाई
जो भी मेरे
साथ रहेगे
उन सबका सम्मान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

सच्चाई की गूँज उठेगी
और बजेगा बाजा
नही बन सकेगा तब कोई
अन्धो में कनवा राजा
नौ सौ बिल्ली
खायेगा जो
उसको तो बदनाम करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।

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