।।ग़ज़ल।।मेेरे ज़मीर का हिस्सा था।।

।।ग़ज़ल।।मेरे ज़मीर का हिस्सा था।।
R.K.MISHRA

तू मेरा दिल, मैं तेरी तस्वीर का हिस्सा था ..
तेरे प्यार का हर गम मेरी जागीर का हिस्सा था .

माना कि इश्क़ की मुसीबतें कोई मायने नही रखती .
तन्हा रहना हो गया मेरी तक़दीर का हिस्सा था .

फ़िर भी फ़सलो में इल्म था मुझे,सकून था मुझे .
वो दर्द तो मेरे प्यार की शहतीर का हिस्सा था .

तेरे जाने से सन्नाटो में भी आहटें नही आती .
दिल भी अपना न हुआ ,शरीर का हिस्सा था .

कोई गुंजाइस ही न बची ,तुम्हे गैरो के साथ पाकर .
मंजिलो से लौट आना मेरे ज़मीर का हिस्सा था .

जब खुदा ने ही लिख़ दिया दर्द ऐ जुदाई ‘मिश्र’ .
तब बदलती कैसे , हाथो की लकीर का हिस्सा था .

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One Response

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/10/2015

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