आत्म गीत

1.
विमल-तनय मतिमान रूप में
था जन्म यह पाया,
कीर्ति-कथा सम्भावी रचने को
था प्रशांत कहलाया ।

शैशव काल-प्रखर स्मृति
मधुकथायें सजतीं,
पुलकित मन-नभ में नित नव
नूपुर भी थीं बजतीं ।

हास-वैभव के उमंगपूर्ण
मुक्ताहल थे सुन्दर,
खिलते नीचे धरती, चहुँ ओर प्रकृति
और ऊपर नीला अम्बर ।

2.
अनागत से था अगम-निहाल
कालचक्र लाया कौमार्य,
कनक-किरण ने मनुहार से सींचा
फिर आया प्रभंजन विकराल ।

विधि स्वरूप करने को ‘कातर’
आये कुछ प्रसंग,
आकुल-आतुर करने को
मार गए वह संग ।

ऋद्धि-सिद्धि उत्कर्ष अवसानित
थे विशय-विपुल विराट,
है जीवन नहीं यह अक्षय
था विषाद उस घाट ।

आरत आर्त्तवाणी को सुनकर
औचक हुआ अनुमान-“नहीं ज्ञात
-क्यों है? –क्या है? सारहीन यह जीवन?
है लेना अब जान ।”

वर्ष कुछ बीते उत्कंठित
‘मानस’ ध्वंसक-प्रश्न-अनल से आहत,
दीपित दिनमान हुआ अंत में
बीत गये सारे अब झंझावत ।

3.
एक पथ – पथिक दो
पतन और उत्थान,
बढ़ा जा रहा था लिये साथ
वे दो पथिक महान ।

‘पतन’ और ‘उत्थान’- गुरु दो!
साथ किया था बारी-बारी,
पल वो भी आया समीकरण
बदलने कि तैयारी ।

मंथर गति से फिर
स्वयं भाग्य था रचना,
तरु-मर्मर खग-गीत
आकर्षण से था अब बचना ।

किंतु फिर बिन इनके
कहाँ रस वह जीवन में,
तो तप कर धृति संग साध लेता हूँ
सिद्धि, सम्पत्ति, सरि-सागर और तिनके ।

उद्दाम-उद्भट हो
फिर मेधा चमकाई,
अखिल रूप में स्वयं को देखा
द्योतक रूप आगमनी सत्य हो आई ।

रचित -24 सितम्बर 2014

4 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 10/10/2015
    • Kumar Prashant Kumar Prashant 12/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/10/2015
    • Kumar Prashant Kumar Prashant 12/10/2015

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