काहे को श्रृंगार करुँ

काहे को श्रृंगार करुँ पिय
काहे को श्रृंगार करुँ

कंगना बदलू मन न लागे
चूड़ी को क्यों हाथ धरु

काहे को श्रृंगार करुँ पिय
काहे को श्रृंगार करुँ

झुमका भी हमको न सोहे
बाली से क्या काज सरु

काहे को श्रृंगार करुँ पिय
काहे को श्रृंगार करुँ

दर्पण भी अब मन न भावे
क्या नयनन से बात करुँ

काहे को श्रृंगार करुँ पिय
काहे को श्रृंगार करुँ

जो तुम गए परदेस
तो देखे कौन हमे ये विचार करुँ

काहे को श्रृंगार करुँ पिय
काहे को श्रृंगार करुँ

One Response

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/10/2015

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