जाने क्यों ?

जाने क्यों इश्क कर बैठा जिंदगी से ,

वरना सिवा धोखे के इसमें रखा क्या है |

जाने क्यों रोया तमाम बचपन इस चाँद के लिए ,

वरना जी को ललचाने और बादलों में छुप जाने के सिवा रखा क्या है |

गीली मिटटी से घरोंदे बनाने की चाहत कभी मिट नहीं पायी,

वरना पहली लहर में जमींदोज हो जाने के सिवा इसमें रखा क्या है |

शरारत का कोई माकूल जरिया न मिला मुझको ,

वरना मदरसे में ‘ अलिफ़ बे ते ‘ के सिवा रखा क्या है|

उनकी तस्वीर छुपाने की मुनासिब जगह मिल नहीं पायी,

वरना किताबों में सिवा बोरियत के रखा क्या है |

उनके हमकदम होने की आरजू थी इस दिल में ,

वरना साल दर साल इम्तहानों में रखा क्या है |

नस-नस में आवारगी बस गयी है मेरे ,

वरना इन पथरीली राहों में खूं-गर होने के सिवा रखा क्या है |

दीदार-ए-चाँद की ख्वाहिश आदत सी हो गयी है ,

वरना साल-दर-साल रोजा-ए-रमजान में रखा क्या है |

इक तेरी हँसी से आबाद है दुनिया मेरी,

वरना लाशों के इस शहर में रखा क्या है |

परवानों ने तो इश्क़ ठानी है मौत से ,

वरना शमां में जल जाने के सिवा रखा क्या है ||

One Response

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 09/10/2015

Leave a Reply