प्रातः गान

जागो रे जगती जागी,
सोम गया, गयी यामिनी;
अंशुमाली यों निकल निकल
भेंट रहा कर कामिनी ।

प्रतीत प्रतिबिम्ब रक्तवर्ण, मधुसूदन उज्जवल तरनि में,
बहा प्रीत पवमान, सधा सरोज, गा उठा प्रभात अवनि में;
द्विज चहके, देख प्रमदा आगमन महका अहा आराम-
दग्ध दिवाकर देख भूमि को देख रहे निज धाम।

पलको पर रख सपने निसार
तुम सजा रहे प्रियतमा हार,
बाकी सब जग जीवन बिसार
अब तक सोये क्या सार !
-औचित्य कुमार सिंह

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 09/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/10/2015

Leave a Reply