निर्भया

जब इस दुनिया में मै आई थी ,
सपनों की सेज सजायी थी |
सपनों की उंगली पकड़-पकड़ कर,
कदम-कदम इठलाई थी |
हर दिन के साथ नया सपना ,
हर सपना लगता था अपना |
कदम बढ़ा कर मैंने ,
हर अवसर को पहचाना है |
खुशियों को था जाना मैंने ,
हर गम मुझसे अनजाना है |

था मेरा भी यही विश्वास ,
पूरी होगी हर आस |
मैं शिक्षित हूँ , मैं सबला हूँ ;
अब और नही मैं अबला हूँ |
लेकिन ये मेरी गलती थी ,
मैं पगली भ्रम में पलती थी |
आखिर मुझसे क्या खता हुयी ,
जो ऐसी मुझको सजा मिली |
अस्मत मेरी उजड़ गयी ,
किस्मत भी मेरी बिगड़ गयी |
मैं भैया की प्यारी बहना ,
माँ-बाप की इज्जत का गहना |
ना बोल सकूगी मैं बिलकुल ,
लेकिन मुझको है कहना |
जो मेरे साथ किया तुमने ,
रक्त अस्मिता का पिया तुमने |
कैसे तुम घर जाओगे ,
बहना से नैन मिलाओगे |
उस बहना से है मुझको कहना ,
तुम भाई नही कसाई हो |
वो मांस बेचता है और तुम
बेच रहे एक भाई हो |
वो गर्दन पर छुरी रखता है ,
तुम इज्जत की लाश गिराते हो |
जिस स्त्री ने तुमको जन्म दिया ,
उसका ही दूध लजाते हो |
जाते-जाते इस दुनिया से
इतना हम कह देते है |
अमानुष अत्याचारों को
हँस-हँस कर सह लेते है |
मुझसे दुनिया की सृष्टि हुयी ,
मेरा अस्तित्व मिटाते हो |
ओ ! दु:शासन की संतानों ,
क्यों जाति विनाश बुलाते हो …..
क्यों जाति विनाश बुलाते हो …..

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/10/2015

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