जुगनू की चाह में…

जुगनू की चाह में जो हम घर से निकल पड़े।
कुछ दोस्त साथ साथ मेरे पीछे चल पड़े।।

भूली बिसरी यादों ने जब दस्तक दी इस दिल पे।
पत्थर हुई नज़र से मेरी आंसू निकल पड़े।।

शर्बती आँखों से उसकी मैं जाम पी गया।
ख़बर नही कदम मेरे के फिर किधर पड़े।।

लहरों को ललकारते थे जो साहिल पे बैठ कर।
भीगी ज़रा ज़मीं तो फिर वो क्यूँ फिसल पड़े।।

देखा ‘आलेख’ उसने कुछ ऎसी निगाह से।
अरमान थे जो दिल में वो फिर मचल पड़े।।

— अमिताभ ‘आलेख’

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 11/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 11/10/2015
  3. sahil khan 10/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 11/10/2015

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