हर वक़्त सुबहो शाम…

हर वक़्त सुबहो शाम जो करते थे गल्तियां ।
आलम न पूछो आज वो ही बताते हैं गल्तियां ।।

उनसे ही हमने सीखा है शराफ़त का ये सबक ।
देखो सुनो सब कुछ मगर बताना न गल्तियां ।।

पूछे कोई उल्फ़त में क्यूँ लुटाया सब कुछ ।
कह देना हर इंसान से होती हैं गल्तियां ।।

‘आलेख’ सोचता हूँ अभी है ज़िंदगी पड़ी ।
एक दिन सुधार लूँगा करी थी जो गल्तियां ।।

— अमिताभ ‘आलेख’

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 11/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 11/10/2015

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