सन्दर्भ

क्षण भर का पागलपन
क्षण भर का गान ,
क्षण भर की सत्ता
क्षण भर का ध्यान;

मेरा प्रण ऐसे तो स्थूल नही था –
इतना ही भंगुर था क्या मेरा होना
मुझसे मेरा जीवन रूठ गया है ,
मेरा होना मुझसे ही छूट गया है |
मैंने जाना मैंने पाया
छूकर मैंने समझाया है ,

पर कुंठित ही सन्दर्भ हुए हैं
और दंश में रस खोया है
मेरा जीवन मुझसे छूट गया है |

परिभाषा अपरिभाषित है
और गीत विनाशी लगते हैं
मेघ सयाने लगते हैं
और हवा पुरानी लगती है
हाँ सृष्टि रचयिता झूठ रहा है ,

मेरे जीवन का तप और अविराम
मेरा मंथन और ये प्रभाव
क्षण भर का जीवन और विहाग ,

गण रहे सदा तेरा कृतार्थ –
तेरी जय हो तेरा ही गान
क्षण भर का ले जा ये विहाग ,
मेरी खुशियाँ मेरा तर्पण
मेरा मद है मेरा प्रणाम |
-औचित्य कुमार सिंह

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 09/10/2015
      • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/10/2015

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