विदा

कैसी रही होगी वो रात ,
जब सिद्धार्थ ने छोड़ा यशोधरा का हाथ |
जन्म-जन्मान्तर का गठबन्धन ,
पितृ धर्म का महान बन्धन||
किन्तु – परन्तु , उचित – अनुचित ,
डिगे नही सिद्धार्थ कदाचित् |
जीवन स्वयं यक्ष प्रश्न है ,
मोक्ष शुक्ल और मृत्यु कृष्ण है ||

स्वर्णाभूषण और भोग विलास ,
मिथ्या दंभ और उल्लास ||
तुच्छ , निरर्थक , निन्द्य प्रलाप ,
विश्व विजय का महा प्रताप ||

ऐसा ही कुछ सोचा होगा ,
समझा होगा , जाना होगा |
राजप्रासाद की ड्योढ़ी लांघी ,
गौतम के भीतर कदम रखा ||
राजपुरुष की मृत्यु हुई ,
रोम-रोम सन्यास पगा ||

किन्तु-

वीर शिरोमणि सिद्धार्थ नही ,
क्षत्राणी थी यशोधरा |
राहुल को भर अंकवारी ,
निद्रा का था स्वांग धरा ||

उन्हें अवश्य था एहसास
स्वामी ह्रदय न बसे सुवास ||

वो निकल पड़े है उस पथ पर ,
जिस पथ का कोई छोर नहीं |
उनको तो ईश्वर मिल जाएंगे ,
हम दोनों का कोई और नहीं ||

हम अनाथ , वो जगन्नाथ ,
विचित्र विषाद का अट्टहास ||

गौतम की उस अमर कृत्य की ,
साधुवाद हो या हो प्रतिवाद |
पुण्य धरा की वीर सपूती के
मन को है अवसाद ||

किंचित ही मैं उन्हें रोकती ,
या राहुल उनको भरमाते |
थाल सजाकर तिलक लगाती ,
सखी वो मुझसे कहकर जाते
सखी वो मुझसे कहकर जाते …………

3 Comments

  1. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 09/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/10/2015

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