एक ख़्वाब जो देखा था मैंने- शिशिर “मधुकर”

एक ख़्वाब जो देखा था मैंने, वो कब का चकनाचूर हुआ
जो चाहा मैंने जीवन में, जीने को उस बिन मजबूर हुआ
ऐसे तो काम ना थे मेरे, जो किस्मत मुझसे रूठ गई
हर निर्णय मेरा गलत हुआ, सारी उम्मीदें टूट गई
अब चारों तरफ अँधेरा है, और कोई ना रस्ता दिखता है
जो घाव दिया है अपनों ने, वो दर्द के साथ में रिसता है
मैंने तो मोहब्बत माँगी थी, फिर क्यों मुझको ये चोट मिली
मेरे जीवन में नहीं है कोई, सच्ची श्रद्धा बिन खोट मिली
क्या यूँ ही गुज़र जाएगी उमर, सूनेपन में खालीपन में
या कोई मुझे भी ढूंढेगा, दीवानो सा अपनेपन में
ऐसा लगता है कहीं कोई, साथी करता है इन्तजार
मन में कहता धीमे से, आने वाली है अब बहार
जब तक ना होगा अपना मिलन, ये तड़प युहीं तड़पाएगी
आ जाएगी जब वो जीवन में, हर कली फूल बन जाएगी.

शिशिर “मधुकर”

6 Comments

  1. sushil sushil 13/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
  3. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/10/2015
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015

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