आह्वाहन

मेरे राग उठो निस्तेज पड़े ,
मेरे गान उठो निर्वेग खड़े ,
क्या लाभ तुम्हारा निहित कहो
आवेग बनो बन ज्वाल बहो |

हैं ध्यानमग्न सब स्वसंधान में
बहते हैं सब निज धार आन में ,
उद्वेलित कर दो इसी तान में
झूमे सब हो एक तान में |

रे मेरे गुथे भाव स्वरोँ-
उत्साह वेग रोर भरो
द्वन्द भर उत्थान करो,
मस्तिष्क में हित ज्ञान भरो |
– औचित्य कुमार सिंह

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/10/2015

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