रंग भरी होली -शिशिर “मधुकर”

यह कविता मैने दो साल पह्ले होली के अवसर पर लिखी थी.

छोड़ो दुनिया भर की चिंता, मत रखो ये मन मैले
आओ मिलकर हम सब फिर से, रंग भरी होली खेलें.

मन में जितना क्रोध भरा है, उतना चटक रंग तुम डालो
जिसको देख के ना देखा हो, उसको भी तुम गले लगा लो
रंग लगने से चेहरों के, विपरीत भाव चुप जाएंगे
प्यार को हमनें दूर किया क्यों, ये सोच के आँसू आएँगे
जिसने अपने अहम को जीता, असली होली उसने खेली
ऐसे व्यक्ति को जीवन में, खुशियाँ मिलती है अलबेली
हममें भी कुछ अलग अलग है, ये रंग यही सिखलाते है
जीवन की इस बगिया में, संग सभी फूल मुस्काते है
होली के इस अवसर पर रंगो में रंग को मिलने दो
ऋतुराज बसंत का स्वागत हो, और नए फूल भी खिलने दो
जो भी जिसको कहना हो, दिल साफ़ करे सुन ले कह ले.

छोड़ो दुनिया भर की चिंता, मत रखो ये मन मैले
आओ मिलकर हम सब फिर से, रंग भरी होली खेलें.

शिशिर “मधुकर”

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 15/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/10/2015
  3. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 16/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/10/2015

Leave a Reply