आज की राखी – शिशिर “मधुकर”

यह कविता मैंने अपनी छोटी बहन जिसका नाम राखी है के लिए तब लिखी थी जब वो कई सालों बाद एक ही शहर मे रह्ते हुए राखी के पर्व पर मेरे घर आई.

भाई-बह्न का त्यौहार राखी
लेकिन प्रेम नहीं है बाकी
बोझ बने ऐसे रिश्तों को
कोई आखिर कब तक ढोए.
उजड़ा बाग़ है सुखी मिट्टी
कोई सन्देश ना कोई चिठ्ठी
टूटी माला के बिखरे मनके
एक धागे में कौन पिरोए .
दर्द में आँसू आते है
हमदर्द के आँसू आते है
पानी ना हो जब आँखों में
संग आँसू वो कैसे रोए.
जाने ये कैसी फ़ितरत है
अपनी भी ऐसे किस्मत है
टूटे कन्धों को मिले सहारे
और हम रिश्तों की लाशें ढोए.
हाथों को बालों में डाले
मधुकर देखे ये खेल निराले
सोचे इतनी उठा पटक का
अंत भला कभी तो होए.

शिशिर “मधुकर”

6 Comments

  1. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 13/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
  3. Uttam Uttam 13/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/10/2015
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015

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