आईने की धूल – शिशिर “मधुकर”

हर कोई इस जहाँ में कुछ पाना चाहता है
अपनी पसंद का गीत सदा गाना चाहता है
मिलता नहीं जब मन का तब स्वप्न टूटते है
संग रहते हुए भी तब दिलों के रिश्ते टूटते है
प्यासे को गर पानी पास ही मिल जाए
आहें भर तड़पता कोई फिर दूर ही क्यों जाए
मैंने तो बस दी थी श्रद्धा और सम्मान की दुहाई
लेकिन कोई आवाज कभी लौट कर ना आई
मिलता है जिस जगह ये वो मुझे पास खींचती है
सुखी हुई धरती को ज्यों बारिश ही सींचती है
मिलता है वही हमको जो हम दूसरों को देते हैं
सोचो कभी हम उसको क्या आसानी से लेते हैं
नफ़रत को दिलों से अपने सदा के लिए मिटा दो
इस आईने पे लगी धूल को पूरी तरह हटा दो.

शिशिर “मधुकर”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/10/2015

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