।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं।।

।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं।।

R.K.MISHRA

राहे मुहब्बत का मरीज़ तो था ही मैं .
साथ तेरा मिला ख़ुशनसीब तो था ही मैं.

एक लम्हा प्यार का भी मुझे न दे सके ,
फर्क न पड़ता तुम्हे हबीब तो था ही मैं .

सकून मिल जाता तुम्हे भी अश्क़ की बरसात से ,
इश्क़ में गम की दवा तबीज तो था ही मैं .

हर सज़ा मंजूर थी और क्या लुटता मेरा.
दिल भी अपना न हुआ गरीब तो था ही मैं .

बाहों में लिपटकर रो लेने दिये होते मुझे ,
फ़ासले कम ही थे और क़रीब तो था ही मैं .

पर दिखा कर इश्क़ की झूठी मुझे नुमाइसे ,
कत्ल किये जज़्बात का नाचीज़ तो था ही मैं .

हर ग़ज़ल,हर नज़्म तेरी आह का शैलाब है ।
वज़्न तेरे गम का है अजीज तो था ही मैं .

5 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 07/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/10/2015
  3. राकेश जयहिन्द राकेश जयहिन्द 07/10/2015
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/10/2015

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