पलको से अशक (गाना)

इतना दर्द सहा है,
की अब उठने की क्षमता नहीं ।
दिल है कह रहा कबसे,
कि बस कर, रुक जा वहीं ।

दर्द से बेहाल ह्रदय,
रो-रो कर रब से,
माफी मांग रहा है,
कह रहा कि अब छोड़ दो मुझे।

अश्क़ों की नदियाँ ,
बह रही हैं इन पलकों से।
अब सहन-शीलता का रब,
ले रहा है इम्तेहान बरसों से।

इन अश्क़ों को रोकना,
थोड़ा मुश्किल है।
क्योंकि ज़िंदगी में जो कमी है,
यह अश्क़ उनके हैं नतीजे।

कभी दर्द-भरी,
तो कभी घम के आसूँ ,
ऐसे हैं प्रकार इसके,
मगर खुशी के अश्क़ों को देखने के लिए, हर दम मैं तरसूं ।

कभी तो वह भी थकेगा,
घम देते-देते।
इन पलकों में थोड़ा सा,
भर देगा अश्क़ खुशी के।

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/10/2015

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