रक्षाबंधन – शिशिर “मधुकर”

यह रचना मैंने रक्षाबंधन के अवसर पर तब लिखी थी जब सामूहिक रूप से कुछ रिश्तेदारों और हमने साथ में यह पर्व मनाया.

बंधनो के इस पर्व पर हम तुम सदा मिलते रहें
मिलने मिलाने के हँसी ये दौर यूँ चलते रहें
जिंदगानी और भी फिर खुशनुमा बन जाएगी
मुश्किल भरी हर रह भी हँसते हुए कट जाएगी.

शिशिर “मधुकर”

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/10/2015
  2. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 14/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/10/2015

Leave a Reply