विस्फोट

चारों तरफ चीथड़े , मांस के लोथड़े फैले हैं
दूर तक फैली निस्तब्ध भूमि,
घुटनों से अक्षम उम्मीदें ,
जीवन की पुरानी उम्मीदें, मेरा मन
सभी भयभीत हैं ।
विस्फोट हुआ है –
मगर फिर भी कहीं कोई प्रसन्न है,
ठहाके लगा रहा है ।
सूनी गोदें, सूने आँचल,
कुछ सहृदय मन
और मानवता
आंसुओं से भीग रहे हैं ।
अमंगल का वर्चस्व है , स्वार्थ फल फूल रहा है
निर्दोष प्राण जल रहे हैं ,
फिर भी इन विस्फोटों पागलपन से
कोई खुश है।
विस्फोट हुआ है।
– औचित्य कुमार सिंह (16.07.2006)

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/10/2015

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