गुमनामी के अँधेरे – शिशिर “मधुकर”

मुझे तुमसे प्यार क्या हो गया
गुमनामी के अंधेरों में मैं खो गया
मैं चला था जगाने अपना सोया नसीब
ये भी क्यों मुझसे खफा हो गया.

मेरे सारे सपने टूट गए
मेरे अपने मुझसे रूठ गए
मेरे अरमानों का गला घुट गया
मेरा सुन्दर सलोना जहाँ लुट गया
मैं बर्बाद पूरी तरह हो गया

मुझे तुमसे प्यार क्या हो गया ——

नुझे तुझसे कोई अब शिकायत नहीं
मैं खुद ही था तेरे लायक नहीं
मैंने ख़्वाब ये ऊँचा देखा था
मुझे तेरी वफ़ा का धोखा था
मुझे अपनी खता का सिला मिल गया.

मुझे तुमसे प्यार क्या हो गया ——

मेरा दिल अब भी तुझ पर मरता है
ये प्यार तुझे ही करता है
इस दिल में तेरी ही मूरत है
हर ओर तेरी ही सूरत है
हाय मुझको ये जाने क्या हो गया.

मुझे तुमसे प्यार क्या हो गया ——

शिशिर “मधुकर”

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