बात कुछ यूँ…

बात कुछ यूँ हो रही है,
कि रोज़ इक ग़ज़ल हो रही है ।

उसकी मेहरबानियाँ यूँ मुझपर,
इस कदर क्यूँ नज़र हो रही हैं ।

वक़्त भी ले रहा है यूँ करवट,
के कलियाँ शजर हो रही हैं ।

उसकी बेबाकियों की चर्चा,
अब तो दर-बदर हो रही है ।

— अमिताभ ‘आलेख’

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 09/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 05/10/2015
  3. राकेश जयहिन्द राकेश जयहिन्द 06/10/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 09/10/2015

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