असहनीय दर्द – शिशिर “मधुकर”

रोज़ सोचता हूँ की मैं उसको भूल जाऊँगा
अपने दिल को विरह के असहनीय दर्द से बचाऊँगा
वैसे भी वो अब किसी की अमानत है
उसके विषय में गलत सोचना भी मुझ पे लानत है
लेकिन मैं ये पाप पल पल कर रहा हूँ
इस खूबसूरत आशीए में जी जी के मर रहा हूँ
पता नहीं मुझको क्यों मौत भी नहीं आती
शायद इस गम से वो भी मेरी मुक्ति नही चाहती
मैं जो भी माँगता हूँ मुझे मिल नही पाता
शायद दर्द ही मेरे इस जनम में लिख चुका है विधाता
लेकिन यदि पुनर्जन्म होता है इस जमीं पर
हे भगवान उसको देना मुझको तू यहीं पर
इसके बदले में तू मुझसे कुछ भी छीन लेना
वो साथ मेरे खुश रहे ये आशीष देना.

शिशिर “मधुकर”

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/10/2015
  3. राकेश जयहिन्द राकेश जयहिन्द 08/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/10/2015

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