“इंसाफ़” डॉ. मोबीन ख़ान

दौलतमंद था तो दोस्तों का काफ़िला साथ था,
पर मुफ़लिसी में दुश्मनों के साथ को भी तरस गया हूँ।।

क्यों लोगों को दूँ अपनी बेगुनाही का सबूत,
अब तो मैं खुदा से भी इंसाफ को तरस गया हूँ।।

इतनी ही अगर तकलीफ़ थी तो मेरे साथ क्यों चले,
मैं अब अपने अकेले पल को तरस गया हूँ।।

तेरी हर झूठीं बातों पर यकीन करा रहा,
मैं तो तेरे मुँह से सच सुनने को तरस गया हूँ।।

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/10/2015
    • Dr. Mobeen Khan Dr. Mobeen Khan 05/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/10/2015

Leave a Reply