तुम बिन रह नही सकता

ये कहना ग़लत था मेरा,
क़ि तुम बिन रह नही सकता||

एक अटूट भरोसा था
पर अब वैसा व्यवहार नही|
बंधन टूट चुका है
शायद दोनो में प्यार नही||
मेरे इल्ज़ामो की फेहरिस्त तो
बड़ी लंबी है मगर सुन ले
तुझे बेवफा कह दे कोई
ये मैं सह नही सकता||

ये कहना ग़लत था मेरा…

हर रोज तस्वीर से तुम्हारी
तुम्हे महसूस करता हूँ|
तुम जा चुकी हो फिर भी
तुम्हे खोने से डरता हूँ||
इंतजार तो आज भी है क़ि
तुम लौट आओ कैसे भी
फिर भी अब खुद से
ये मैं कह नही सकता ||

ये कहना ग़लत था मेरा…

कुछ अपने हसीन लम्हो को
कागज पर सज़ा दिया|
तुम्हारी यादो को समेटा
एक नगमा बना दिया||
हर दिन टूट जाता है कुछ मुझमे
तुम्हे समेटने की चाहत में
फिर भी मुस्कराता हूँ मैं
ये आंशू बह नही सकता||

ये कहना ग़लत था मेरा…

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/10/2015

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