आगे के बारे में एक ईर्ष्यासूत कविता

वे तो बढ़े ही चले जा रहे थे
आगे, और आगे
और आगे के बारे में उनकी राय तय हो चुकी थी
कि जहाँ पीछेवालों की इच्छाएँ जाकर पसर जाएँ
कि जहाँ आप दयनीयता पर क्रोध करने को स्वतन्त्रा हों
कि जहाँ जमाने-भर की ईर्ष्याएँ
आपका रास्ता बुहारें
उस जगह को आगे कहते हैं
वे आगे वहाँ
दुनिया-भर की ईर्ष्या पर मुटिया रहे थे
और बीच-बीच में फोन करके पूछते थे,
हैलो, अरे तुम कहाँ ठहरे हुए हो ?
रास्ता उन्हें अध्यात्म की तरह लगता था
जैसे किसी को धर्म का डर लग जाता है
कि लीक छोड़कर
चाय की दूकान तक भी जाते
तो ‘चलूँ-चलूँ’ से छका मारते
एक किसी भी दिन
वे उतरते नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर
और शहर के सबसे स्मार्ट रिक्शावाले को
रास्ता बताते हुए शहर पार करने लगते
कि जैसे बरसों से इसे जानते हों
वे अपने भीतर और शहर में
एक खाली कुआँ तलाश करते
जो उन्हें मिल जाता
वे एक मकसद का आविष्कार करते
जो पिछले एक करोड़ साल से इस दुनिया में नहीं था
वे किराए के पहले कमरे की कुँआरी दीवार की तरह
मुँह करके खड़े होते, और कहतेदृ
कि जो जा चुके हैं आगे, उन्हें मेरा सलाम भेजो
कि मैं आ गया हूँ
कि यह लकीर जिसे तुम रास्ता कहती हो
अब बढ़ती ही जाएगी, बढ़ती ही जाएगी मेरे पैरों के लिए
कि मैं रुकने के लिए नहीं हूँ
चलो, नीविबन्ध खोलो, झुको और खिड़की बन जाओ
और ऊँचाइयों पर खुदाई शुरू कर देते
कि कुँओं को पाटना तो पहला काम था
कुएँ जो लालसा के थे
यूँ एक करोड़ साल बाद
राजधानी दिल्ली में एक और सृष्टि का निर्माण शुरू होता
एक बौना आदमी
आसमान के इस कोने से उस कोने तक तार बाँध देता
कि यहाँ मेरे कपड़े सूखेंगे
भीड़ के मस्तक को खोखला कर एक अहाता निकाल देता
कि यहाँ मेरा स्कूटर, मेरी कार खड़े होंगे
दुनिया के सारे आदमियों को
एक-के-ऊपर-एक चिपकाकर अन्तरिक्ष तक पहुँचा देता
कि इस सीढ़ी से कभी-कभी मैं इन्द्रलोक
जाया करूँगा जस्ट फॉर ए चेंज

और इन्द्रलोक पहुँचकर अकसर वह फोन करता,
पूछता, हैलो, अरे तुम कहाँ अटक गए ?
इस तरह इन छवियों से छन-छनकर
जो आगे आता था
वह लगभग-लगभग दिव्य था
लगभग-लगभग एक तिलिस्म
कि हर गली के हर मोड़ से उसके लिए रास्ता जाता था
लेकिन सबके लिए नहीं
कि वह दुकानों-दुकानों बिकता था पुड़िया में
पर सबके लिए नहीं
कि वह कभी-कभी सन्तई हाँक लगाता था
खड़ा हो बीच बजार
लेकिन वह भी सबके लिए नहीं
रहस्य यही था
कि वह सबका था
लेकिन सबके लिए नहीं था
ऐसे उस आगे की आँत में उतरे जाते थे कुछ–
अंग्रेजी दवाई-सेदृतेज़ और रंगीन
और कुछ अटक गए थे, ठीक मुहाने पर आकर कब्ज की तरह
और सुनते थे कभी-कभी
पब्लिक बूथ पर हवा में लटके
चोंगे से रिसती हुई एक हँसती-सी आवाज़
कि, हैलोऽऽ, अरे तुम कहाँ फँसे हो जानी !

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