श्रद्धावादी वक़्त में

श्रद्धा का सूर्य शिखर पर था
सबसे ठंडे मौसम में भी जो गर्माती रहती थी भीतर ही भीतर
चपल चापलूसी की चलायमान चांदी गुफ़ा में दहकती थी जो सतत,

ठंडी अपराजेय वह आग
अपनी नीली लपटों से झुलसाती सृष्टि को

कि पिघल बह गया शरीर
शरीर के डबरे में भर गया
बची बस एक आँख तैरती
पूछती
बोल-बोलकर–
कि श्रद्धा से लबालब इस महागार में है कोई सीट खाली
बैठकर हिलने के लिए
दमकते वक्तृत्व की ताल पर
झमाझम व्यक्तित्व की चाल पर !

कि हम अपने पहलों से थोड़े छोटे
हम चाहते हैं कि
पहले से छोटी हमारी आज की दुनिया में
हमें हमारी जगह मिले

कि कल हम भी
आज के मंच से छोटे
एक मंच के मालिक होंगे
श्रद्धा उपजाने की मशीन से
कातेंगे वहाँ बैठ अपनी नाप से छोटे कपड़े
अपने बादवालों के लिए

जितनी मेहनत हमने की
उससे कम मेहनत करने की सुविधा देंगे
अपने अनुजों को
सिखाएंगे उन्हें इससे भी घोर अनुकरण
और मनीषा जिसके जेबी संस्करण
श्रद्धेय ने हमें दिए
उन्हें हम आनेवाले उन जिज्ञासुओं की
उंगलियों पर बटन बनाकर धर देंगे
कि वे जब चाहें
पा लें अपने पापों के तर्क

सो, हे मानवी मेधा के साकार पुरुष
अपने असंख्य खम्भों वाले इस छोटे से दालान में
हमें बताइए, कि अपनी इन योजनाओं के साथ हम कहाँ बैठें!

हमें अभिनय करना पड़ता है परवाह का
बीच बाजार, जब हम पकड़े जाते हैं,
अपने अगलों को हम देंगे खूब सारा अंधेरा
कि सुस्थ, बाइत्मीनान बैठ वे सोच सकें
सबसे बकवास किसी मसले पर,
मसलन मसला मालिक के मूड का
फसलन फसला फालिक के फूड का
हमसे भी ज्यादा सुलभ तुक उन्हें मिले
हर जंग वे जीतें और अंग भी न हिले

आपने हमें दी सूक्तियाँ
हम उन्हें दें कूक्तियाँ।

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