अपनेपन की छाँव – शिशिर “मधुकर”

रोज़ की मुस्कराहटों के बाद
आखिर तुमने पूछ ही लिया
मुझसे मेरी तन्हाई का सबब.
लेकिन तुम क्या जानो कि
मैं तुमसे सब कुछ छुपा गया
और तुम्हारे हर सवाल और सलाह पर
केवल मुस्करा गया
पता नहीं तुम मेरी पीड़ा को समझी या न समझीं
लेकिन फिर भी मैं तुम्हारे उस अधिकार को ज़रूर समझ पाया
जिससे तुमने आज मुझसे रूककर बातें की थी
और मेरे इस रेतीले तपते जीवन को
अपनेपन की ठंडी छाँव दी थी.

शिशिर “मधुकर”

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