मुक्ति का बंधन – शिशिर “मधुकर”

यह कविता मैंने अपनी एक सहयोगी मुक्ति त्रिवेदी को उसकी शादी के अवसर पर उपहार स्वरुप दी थी.

मुक्ति देखो बंधन में बंध रही है
साजन के घर डोली चढ़ के चली है.

मन में उमंगो का संसार लेकर
आँखों में निश्छल सरल प्यार लेकर
बाबुल की यादों को दिल में संजोए
ममता के फूलों की माला पिरोए
सजना के जीवन में सुगंध कर रही है.

मुक्ति देखो बंधन में बंध रही है
साजन के घर डोली चढ़ के चली है.

भाई व् सखियों को सबको रुलाकर
बचपन की यादों को पीछे भुलाकर
जीवन को करती पिया के हवाले
सैंया की नैय्या की डोर सँभाले
जीवन को खुशियों से सध रही है.

मुक्ति देखो बंधन में बंध रही है
साजन के घर डोली चढ़ के चली है.

शिशिर ‘मधुकर”

11 Comments

  1. SONIKA SONIKA 12/10/2015
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/10/2015
  2. SONIKA SONIKA 12/10/2015
  3. SONIKA SONIKA 12/10/2015
  4. SONIKA SONIKA 12/10/2015
  5. Bimla Dhillon 13/10/2015
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
  6. Rinki Raut Rinki Raut 13/10/2015
  7. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015
  8. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/10/2015
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/10/2015

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