मेरी जीवन संगिनी – शिशिर “मधुकर”

तुम मेरी जीवन संगिनी हो सब ये समझते और मानते हैं.
वैसे भी मेरे तुम्हारे विवाह को बारह साल के लगभग हो गए हैं.
तुम मेरा खाना बनाती हो
मुझसे हुए बच्चों को बहुत प्यार करती हो
और उनका पूरा ख्याल रखती हो.
उनकी छोटी से छोटी जिद व इच्छा को पूरा करती हो
और कोशिश करती हो कि उन्हें कोई दुःख ना पहुँचे.
वस्तुतः तुम एक अच्छी माँ हो
और बच्चे भी तुमसे खूब चिपटते है और अपने बचपन को जीते हैं.
तुम्हे अपने माता पिता का कितना ख्याल खयाल है.
तुम्हारी हर समय उनके बारे में इतनी अच्छी सोच
निश्चित ही तुम्हे एक महान बेटी बनाती है.
जिस पर किसी भी माता पिता को नाज़ होगा.
तुम एक महान बहिन भी हो
तुम्हारे मुख से अपने भाई व बहनों के लिए
निकलने वाले फूलों से कोमल शब्द
और उनकी सदैव उन्नति के लिए प्रार्थना
कितनी भावुक एवं वास्तविक होती है
इसका अक्सर मुझे एहसास होता है.
जब तुम अपनी बहिन के पति, उसके बड़े भाई -बहनों
अपने भाइयों व उनकी पत्नियों और अन्य रिश्तेदारों
की सफलता पर इठलाती हो तो.
तुम्हारा गर्व निश्चित ही देखने लायक होता है.
लेकिन तुम्हारी इन सभी खूबियों के बीच
जब भी मैं कभी अपने घर की बहू
भाई-बहनों की भाभी, अपनी पत्नी व प्रेमिका को ढूंढता हूँ तो
मुझे दूर तक कुछ नहीं दिखता.
तुम्हारी इस स्थिति को देख मुझे कष्ट एवं आश्चर्य होता है.
क्योंकि मैं इसमें तुम्हारा नुकसान देखता हूँ.
जो मैं कभी नहीं चाहता.
मैं पाता हूँ कि पिछले बारह वर्षों में तुमने तो कुछ पाया ही नहीं.
तुम्हारे पास जो था तुम तो उससे आगे बढ़ ही नहीं पाई.
तुमने पत्नी बहू व भाभी बननें के सारे अवसर व्यर्थ गवां दिए.
और इस तरह जीवन को आने वाले बदलावों और
रसमय उन्नति से दूर कर एकदम नीरस कर दिया.
तुम्हे ही जिसका नुकसान अंततः भोगना है.
क्योंकि जब तुम्हे इन रिश्तों की नितांत आवश्यकता होगी
तो तुम अपने को एकदम अकेला पाओगी और
तब मैं चाह कर भी कुछ ना कर सकूँगा.

शिशिर “मधुकर”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/10/2015

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