जैविक खेती

सूख रहा धरती का कण -2
हरियाली मिटती जाती है,
शस्य श्यामला वसुंधरा की
सुंदरता घटती जाती है||

गगन पवन मई जहर घुल रहा
भूमि बन रही ऊसर बंजर,
रही धरोहर जो हम सबकी
वही संपाति हो रही जर्जर||

प्राकृतिक संपदा उजड़ रही
टूट रहा माटी से नाता,
धन की चाहत में मनुज का
प्रेम धरती से घटता जाता||

धधकती है छाती धरती की
वर्षा ने मुख मोड़ लिया,
हरियाली छाने के इंतेजार से
पक्षियो ने नाता तोड़ लिया||

जैविक खेती अपनाने से
जीवन सुखमय हो जाएगा
सम्मान भी वापस लौटेगा
अमृतरस फिर भर जाएगा||

2 Comments

  1. omendra.shukla omendra.shukla 03/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/10/2015

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