ग़ज़ल

गिर रहें हैं पात देखो , वृक्ष अब रोने लगा है |
जा रही है रात देखो , चाँद अब रोने लगा है ||
था लगाया मैंने मरहम , रात को जिस घाव पर ,
वह पुराना घाव देखो , अब पुन: रिसने लगा है ||
रह रहा था मौज से , और शान से था घूमता ,
फुटपाथ पर है आज देखो , अब पुन चलने लगा है ||
जिस शहर में कल तलक , शांति का बाजार था ,
बदनाम तबका आज देखो , अब वहां रहने लगा है ||
श्वान जिनको कल तलक , हड्डियों से प्यार था ,
आदमी का रक्त देखो , अब वही पीने लगा है ||
मैंने सुना दर्पण सदा ही , ईमान का है साथ देता ,
बिम्ब कैसे आज उसमे , धुंधलका दिखने लगा है ||
रंगीन कपड़े मैं पहनकर , घूमता हूँ जब यहाँ ,
हर व्यक्ति देखो आज पंकज , ताने पुन: कसने लगा है ||
आदेश कुमार पंकज

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/10/2015

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