ग़ज़ल

दीप जिनके लिये तुम जलाते रहे |
फूंक – फूंक वे उसको बुझाते रहे ||
तुम पिलाते रहे दूध जिन विषधरों को ,
वही नाग बनकर डराते रहे ||
तुम लड़ते रहे हो जिनके लिये ,
शत्रु बनकर लहू वे बहाते रहे ||
सीचतें तुम हो रहे जिसके चमन को ,
आग लेकर वे उसको जलाते रहे ||
तिनके तिनके से तुमने बनाया जो घर ,
वे ग़ददार उसको गिराते रहे ||
सुई बनकर के पंकज तुम सीते रहे ,
बन कैंची वे उसको कतरते रहे ||
आदेश कुमार पंकज

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  1. omendra.shukla omendra.shukla 02/10/2015

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