जीवन के अनमोल पल

तड़पती हो तुम भी तड़पता हूँ मैं भी
फिर भी नहीं कर पाते हैं प्यार
झिझक में हिचक में इन झूठे सचों में
कहीं ना गुज़र जाए ये अनोखी बहार
किस्मत से जीवन में आती है कुछ के
मोहब्बत भरी ये मदहोश शाम
जी भर के जी लो और खूब पी लो
खुशियों की मय से भरे लब के जाम
लौट के फिर ना कभी आएँगे अब
गुजरते जीवन के अनमोल पल
इनको संजो लो मन में पिरो लो
इनके सहारे काट जाएंगे कल
हमेशा ना होगा जवानी का आलम
सच से होंगे सभी रूबरू
कितना भी हँसना, रोना, तड़पना
सपना नया फिर ना होगा शुरू
खोलो ये बंधन और तोड़ो दीवारें
दिलों को दिलों से मिला दो अभी
कितना सुहाना होगा वो मंजर
जब खुलकर मोहब्बत करेंगे सभी.

शिशिर “मधुकर”

2 Comments

  1. omendra.shukla omendra.shukla 02/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/10/2015

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