“बचपन की यादें”

अल्हड़ सा अटखेलता सा मुस्कुराता सा बचपन मेरा
जाने कहा खो गया वो बीता हुआ कल मेरा
न काम का बोझ था न जिंदगी की परवाह थी
न मरने की तमन्ना न जीने की चाह थी
हर वक्त शरारते बस जिंदगी में बेशुमार थीं
मुस्कुराते मेरे चेहरे पे खुशियाँ हज़ार थीं
बढ़ते चले कदम मेरे उम्र की इस रेत पर
जैसे मानो बड़ रहे हों कांटो की सी सेज पर
यादें रह जाती हैं जिंदगी के पहलु में
अब लगता है की दो पल की है जिंदगी
हर पल ख़ुशी से इसका जी लूँ मैं
बचपन अपना अब मैं नन्हें फरिश्तों में जीने लगा हूँ
उनकी प्यारी प्यारी बातो में अपनी मुश्किलों का हल ढ़ूढ़ने लगा हूँ
शायद इसी का नाम जिंदगी है जिसको अब मैं जीने लगा हूँ …..

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/10/2015
  2. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 01/10/2015

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