“”” आदम, “आदम का गलीचा “”’

“””””””””” आदम, “आदम का गलीचा “”'””””””””

नैन खुले थे जब मेरे,, सोचा दुनियां मैं भी देखूँ
देखूं यौवन-उपवन जग की,, सुन लूँ कोयल की कू-कू |
सुना खूब दुनियां को कहते,, कुदरत की छटा, निराली है
मंद-मंद, भीनी-भीनी,, करती कोई कव्वाली है |
दौड़ा मेरे क़दमों का चेतक,, दुनियां की दौड़ लगाने को
कदम लगाम थामे था मन,, हड़काता तेज़ भगाने को |
देखा जो आँखों ने मंज़र,, ज़मींदोज़ हुए चेतक से कदम
छोड़ लगाम गिर गया मन,, उत्साह था पड़ा बेसुध-बेदम |
ख़्वाब संजोये था जो मन,, पल भर में हुए वो सारे क्षीण
शमशीर जुबां भेदन को राज़ी, नज़रों से टपके कपट-हीन |
कैसी दुनियां, कैसे इंसान,, यहाँ जीते सब, कोई ना ज़िंदा है
इन्सां, इंसां के हाथों बंद,, पिंजरे में कोई परिंदा है |

“उथल-पुथल सी मन में थी,, दिल पूछे यूँ बन के सवाली
मुझको बस तू एक बात बता,, ऐ मेरे जग के माली…………….
ऊचें ठौर, हर दिल में चोर,, ये कैसा तेरा बगीचा है
आदम, आदम के क़दमों नीचे,, जैसे के कोई गलीचा है” ||

किसी की आँखों में आस नहीं,, तो किसी के जीवन चल रास रही
किसी के चादर छने दुआ की बारिश,, किसी की पूरी “बिन दुआ कही |
किसी के सपने भी ख़्वाब हुए,, किसी के अरमाँ नाचे-गाए
रक़ीब यहाँ तो तन भी नहीं,, आदम, आदम को ना भाए |
क्या शंख रंज का है गूंजा,, या फिर है कोई दबा मसला
इंसां, इंसां के द्वारा ही,, क्यों जाता है यहाँ मसला |
क्या बाँट खुदा ने भेजा है,, आदम को आदम का हकनामा
जिस्म-ओ-साँसों के पिंजर को,, एक दूजे जिस्म ने है थामा |
मैंने तो सुना था एक मगर,, देखन को मिली यहाँ दो दुनियां
एक खरीददार उपहास का है,, दूजा जबरन बेचे खुशियां |

“उथल-पुथल सी मन में थी,, दिल पूछे यूँ बन के सवाली
मुझको बस तू एक बात बता,, ऐ मेरे जग के माली…………….
ऊचें ठौर, हर दिल में चोर,, ये कैसा तेरा बगीचा है
हर कदमों के नीचे देखो,, मानवता का बिछा गलीचा है ||
By Roshan Soni

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/10/2015
    • roshan soni roshan soni 01/10/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 02/10/2015
    • roshan soni roshan 03/10/2015

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