बहनें

बहनें होती हैं,
अनबुझ पहेली-सी
जिन्हें समझना या सुलझाना
इतना आसान नही होता जितना
लटों की तरह उलझी हुई दुनिया को ,

इन्हें समझते और सुलझाते …में
विदा करने का दिन आ जाता है न जाने कब
इन्हें समझ लिया जाता अगर वो होती …
कोई बन्द तिजोरी…
जिन्हे छुपा कर रखते भाई या कोई…
देखते सिर्फ़…
या …कि होती …
सांझ का दिया …
जिनके बिना …
न होती कहीं रोशनी…

पर नही़
बहनें तो पानी होती हैं
बहती हैं… इस घर से उस घर
प्यास बुझातीं
जी जुड़ातीं…किस-किस का
किस-किस के साथ विदा
हो जातीं चुपचाप…

दूर तक सुनाई देती उनकी
रुलाई…
कुछ दूर तक आती है…माँ
कुछ दूर तक भाई
सखियाँ थोड़ी और दूर तक
चलती हैं रोती-धोती
… …
फिर वे भी लौट जाती हैं घर
विदा के दिन का
इंतज़ार करने…
इन्हें सुलझाने में लग जाते हैं…
भाई या कोई…।

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